भारत में आरक्षण व्यवस्था: संपूर्ण एवं विस्तृत विश्लेषण और आज के परिप्रेक्ष्य में मूल्यांकन — यह कितना सही और कितना गलत है?

भाग 1: आरक्षण का संपूर्ण इतिहास (Total History) — एक गहरा विश्लेषण

भारत में आरक्षण की कहानी केवल आजादी के बाद की नहीं है। यह सदियों से चले रहे सामाजिक स्तरीकरण (Social Stratification) और औपनिवेशिक शासन की नीतियों का परिणाम है।

1. आजादी से पहले का दौर (1882 - 1947)

. महात्मा ज्योतिराव फुले और हंटर कमीशन (1882)

·       पृष्ठभूमि: ब्रिटिश काल में शिक्षा और प्रशासन पर केवल कुछ उच्च जातियों का एकाधिकार था।

·     गहरी घटना: जब 1882 में शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए 'हंटर कमीशन' भारत आया, तब समाज सुधारक ज्योतिराव फुले ने उनके सामने एक विस्तृत मांग पत्र रखा। उन्होंने तर्क दिया कि जब तक देश की बहुसंख्यक पिछड़ी और वंचित आबादी को मुफ्त शिक्षा और सरकारी नौकरियों में उनकी जनसंख्या के अनुपात में जगह नहीं मिलेगी, तब तक समाज का विकास असंभव है। यह आधुनिक भारत में 'समान प्रतिनिधित्व' की पहली औपचारिक मांग थी।

. छत्रपति शाहू जी महाराज का ऐतिहासिक कदम (1902)

·      ऐतिहासिक संदर्भ: कोल्हापुर रियासत के राजा शाहू जी महाराज ने देखा कि उनके प्रशासन में पिछड़े वर्ग के लोगों की संख्या के बराबर थी।

·     कदम: 26 जुलाई 1902 को उन्होंने एक ऐतिहासिक घोषणा की। उन्होंने अपने राज्य के प्रशासनिक पदों पर पिछड़े वर्गों (Non-Brahmins और वंचितों) के लिए 50% आरक्षण लागू कर दिया। इसके लिए उन्हें तत्कालीन रूढ़िवादी समाज के भारी विरोध का सामना करना पड़ा। यही कारण है कि शाहू जी महाराज को भारत की आधुनिक आरक्षण व्यवस्था का अग्रदूत माना जाता है।

. मद्रास प्रेसिडेंसी का कम्यूनल जी.. (1921)

·     दक्षिण भारत में गैर-ब्राह्मण आंदोलनों (जैसे जस्टिस पार्टी) के भारी दबाव के बाद, ब्रिटिश सरकार ने 1921 में 'कम्यूनल गवर्नमेंट ऑर्डर' (Communal G.O.) जारी किया। इसके तहत सरकारी नौकरियों को विभिन्न समुदायों (गैर-ब्राह्मण, ब्राह्मण, मुसलमान, भारतीय ईसाई और दलित) के बीच उनकी आबादी के अनुपात में विभाजित किया गया ताकि किसी एक वर्ग का एकाधिकार रहे।

. पूना पैक्ट (1932): सामाजिक बनाम राजनीतिक अधिकार

·      विवाद: ब्रिटिश प्रधानमंत्री रामसे मैकडोनाल्ड ने 'कम्यूनल अवार्ड' (Communal Award) की घोषणा की, जिसके तहत दलितों (Depressed Classes) को हिंदुओं से अलग मानकर उनके लिए 'पृथक निर्वाचक मंडल' (Separate Electorate) की व्यवस्था की गई। डॉ. बी.आर. अंबेडकर इसके पक्ष में थे क्योंकि उनका मानना था कि इससे दलितों को वास्तविक राजनीतिक शक्ति मिलेगी।

·       गांधी जी का अनशन: महात्मा गांधी इसके सख्त खिलाफ थे। उनका मानना था कि इससे दलित हिंदू समाज से हमेशा के लिए अलग हो जाएंगे और अछूत प्रथा को स्थायी मान्यता मिल जाएगी। उन्होंने यरवदा जेल में आमरण अनशन शुरू कर दिया।

·     समझौता: अंततः 24 सितंबर 1932 को गांधी जी और डॉ. अंबेडकर के बीच 'पूना पैक्ट' हुआ। इसके तहत पृथक निर्वाचक मंडल की मांग छोड़ दी गई, लेकिन प्रांतीय और केंद्रीय विधानसभाओं में दलितों के लिए आरक्षित सीटों की संख्या (71 से बढ़ाकर 148) कर दी गई।

2. आजादी के बाद का दौर और संवैधानिक ढांचा (1950)

जब भारत का संविधान लिखा जा रहा था, तब डॉ. बी.आर. अंबेडकर और संविधान सभा के सदस्यों ने माना कि भारत में समानता (Equality) लाने के लिए केवल 'समान अवसर' देना काफी नहीं है। जो वर्ग सदियों से पीछे धकेल दिया गया है, उसे दौड़ में बराबर लाने के लिए विशेष छूट (Affirmative Action) देनी होगी।

       अनुच्छेद 15(4):  यह राज्यों को सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े नागरिकों या अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) की उन्नति के लिए विशेष प्रावधान (जैसे स्कूलों/कॉलेजों में सीट आरक्षण) बनाने की शक्ति देता है।

       अनुच्छेद 16(4):  यह राज्य को सरकारी नौकरियों में उन पिछड़े नागरिकों के लिए पद आरक्षित करने की अनुमति देता है, जिनका राज्य की सेवाओं में 'पर्याप्त प्रतिनिधित्व' नहीं है।

         समय सीमा का सबसे बड़ा भ्रम:  आज समाज में यह आम धारणा है कि आरक्षण केवल 10 साल के लिए लागू किया गया था। यह पूरी तरह सच नहीं है। संविधान के अनुच्छेद 334 के तहत केवल लोकसभा और विधानसभाओं में सीटों का आरक्षण (राजनीतिक आरक्षण) 10 वर्षों के लिए था। नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण (अनुच्छेद 15 और 16) के लिए संविधान में कोई समय सीमा नहीं लिखी गई थी; इसे तब तक जारी रहना था जब तक कि सामाजिक समानता हासिल हो जाए।

3. मंडल आयोग और ओबीसी (OBC) राजनीति का उदय (1979 - 1992)

·    आयोग का गठन: 1979 में मोरारजी देसाई सरकार ने बी.पी. मंडल की अध्यक्षता में 'द्वितीय पिछड़ा वर्ग आयोग' (Mandal Commission) का गठन किया। आयोग ने देश का व्यापक सर्वेक्षण किया और पाया कि भारत की लगभग 52% आबादी 'अन्य पिछड़ा वर्ग' (OBC) के अंतर्गत आती है, जो सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ी हुई है।

 

·       सिफारिश: आयोग ने ओबीसी के लिए सरकारी नौकरियों में 27% आरक्षण की सिफारिश की।

 

·   कार्यान्वयन और विरोध (1990): अगस्त 1990 में तत्कालीन प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह ने मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने की घोषणा की। इसके बाद देश भर में, विशेषकर उत्तर भारत में, सवर्ण छात्रों द्वारा हिंसक आंदोलन किए गए। कई छात्रों ने आत्मदाह का प्रयास किया। इस घटनाक्रम ने भारतीय राजनीति को हमेशा के लिए 'मंडल बनाम कमंडल' की राजनीति में बदल दिया।

इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ (1992) — लैंडमार्क जजमेंट

इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। 9 जजों की संवैधानिक पीठ ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया:

       1. 27% कोटा वैध:  कोटे ने ओबीसी को 27% आरक्षण देने के फैसले को सही ठहराया।

       2. 50% की सीमा (50% Cap):  कोर्ट ने साफ कहा कि विशेष परिस्थितियों को छोड़कर कुल आरक्षण 50% से अधिक नहीं हो सकता, ताकि योग्यता और सामाजिक न्याय में संतुलन बना रहे।

   3. क्रिमी लेयर (Creamy Layer):  कोर्ट ने आदेश दिया कि ओबीसी वर्ग के अमीर और समृद्ध लोगों को आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए। इसके लिए एक आर्थिक सीमा (वर्तमान में ₹8 लाख सालाना) तय की गई।

     4. पदोन्नति में आरक्षण नहीं:  कोर्ट ने शुरुआत में कहा कि आरक्षण केवल शुरुआती नियुक्ति में होगा, प्रमोशन (Promotion) में नहीं (हालांकि बाद में संशोधनों के जरिए इसमें बदलाव किए गए)

4. आर्थिक आरक्षण: ईडब्ल्यूएस (EWS) का आगमन (2019)

·       103वां संविधान संशोधन: जनवरी 2019 में संसद ने एक बड़ा कदम उठाते हुए संविधान में अनुच्छेद 15(6) और 16(6) जोड़े। इसके तहत सामान्य वर्ग (General Category) के उन लोगों के लिए 10% आरक्षण की व्यवस्था की गई जो आर्थिक रूप से कमजोर हैं।

·      महत्व: यह भारत के इतिहास में पहली बार था जब सामाजिक पिछड़ेपन (जाति) के बजाय शुद्ध रूप से आर्थिक स्थिति (Income) को आरक्षण का आधार बनाया गया।

·       सुप्रीम कोर्ट की मुहर (2022): नवंबर 2022 में सर्वोच्च न्यायालय ने 3:2 के बहुमत से ईडब्ल्यूएस आरक्षण को संवैधानिक रूप से वैध ठहराया और स्पष्ट किया कि यह 50% की सीमा का उल्लंघन नहीं करता क्योंकि वह सीमा जातिगत आरक्षण के लिए थी।

5. उप-वर्गीकरण (Sub-categorisation) पर सुप्रीम कोर्ट का नया फैसला (2024)

      समस्या: दशकों से यह देखा गया कि SC और ST श्रेणियों के भीतर कुछ ही जातियों को आरक्षण का अधिकतम लाभ मिल पा रहा था, जबकि अत्यंत पिछड़ी उप-जातियां आज भी वंचित थीं।

    फैसला: 1 अगस्त 2024 को सुप्रीम कोर्ट के 7 जजों की पीठ ने 6:1 के बहुमत से एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया। कोर्ट ने राज्यों को अनुमति दी कि वे SC और ST श्रेणियों के भीतर भी उप-वर्गीकरण (Sub-categorisation) कर सकते हैं। यानी, कोटे के अंदर कोटा (Quota within Quota) दिया जा सकता है ताकि सबसे पिछड़ी जातियों को प्राथमिकता मिले। साथ ही, जजों ने SC/ST में भी 'क्रिमी लेयर' लागू करने की वकालत की।

भाग 2: आज के परिप्रेक्ष्य में मूल्यांकनयह कितना सही और कितना गलत है?

आरक्षण व्यवस्था आज भारतीय समाज में सबसे ज्यादा बहस का विषय है। इसके दोनों पक्षों के पास बेहद मजबूत और तार्किक तर्क हैं।

आरक्षण क्यों सही है? (The Deep Merits)

1.  ऐतिहासिक अन्याय का सुधार (Correcting Historical Wrongs): भारत में हजारों सालों तक एक बड़े वर्ग (अछूत और पिछड़ों) को शिक्षा प्राप्त करने, संपत्ति रखने और सम्मानजनक काम करने के अधिकार से वंचित रखा गया। आरक्षण कोई गरीबी हटाओ कार्यक्रम नहीं है, बल्कि यह उस ऐतिहासिक अन्याय को सुधारने और समाज के हर वर्ग को सत्ता प्रशासन में हिस्सेदारी देने का साधन है।

2.  विविधता और समावेशी प्रशासन (Diversity in Governance): यदि किसी देश के पुलिस प्रशासन, कलेक्टरेट और न्यायपालिका में केवल एक या दो उच्च वर्गों के लोग बैठे होंगे, तो वे जमीन पर रहने वाले गरीबों और वंचितों के दर्द को पूरी तरह नहीं समझ पाएंगे। आरक्षण ने नौकरशाही का लोकतांत्रीकरण (Democratization) किया है। आज एक दलित या पिछड़े वर्ग का व्यक्ति भी जिले का मुख्य प्रशासनिक अधिकारी बनकर नीति निर्धारण कर रहा है।

3.  सामाजिक गतिशीलता (Social Mobility): एक सरकारी नौकरी केवल एक व्यक्ति को रोजगार नहीं देती, बल्कि वह पूरे परिवार को गरीबी के दुष्चक्र (Vicious Cycle of Poverty) से बाहर निकाल देती है। आरक्षण के कारण करोड़ों वंचित परिवारों की आने वाली पीढ़ियां पढ़-लिखकर मुख्यधारा में शामिल हो सकी हैं।

आरक्षण क्यों गलत है? (The Deep Flaws)

1.  वोट-बैंक और जातियों का स्थायीकरण (Perpetuation of Casteism): आरक्षण का उद्देश्य जातिवाद को खत्म करना था, लेकिन राजनीति ने इसे जातिवाद को बढ़ाने का जरिया बना दिया। आज पार्टियां चुनाव जीतने के लिए जातियों को गोलबंद करती हैं और नए-नए आरक्षण के वादे करती हैं। इससे समाज में जाति की पहचान और अधिक मजबूत हो गई है, जबकि आधुनिक युग में जाति की प्रासंगिकता खत्म होनी चाहिए थी।

2.  आरक्षण का कुलीन वर्ग (The Elite Capture / Creamy Layer Loop): आरक्षण व्यवस्था की सबसे बड़ी विफलता यह है कि इसका लाभ 'ऊपर से छनकर नीचे तक' नहीं पहुंच पा रहा है। उदाहरण के लिए, यदि किसी SC/ST परिवार में दादा IAS बने, पिता IPS बने, तो उनके बच्चों को भी आरक्षण का लाभ मिलता है। इसके विपरीत, उसी श्रेणी की किसी बेहद गरीब, ग्रामीण सफाई कर्मचारी या मजदूर की संतान उस उच्च-शिक्षित परिवार के बच्चे से मुकाबला नहीं कर पाती। नतीजा यह है कि आरक्षित वर्ग के भीतर ही एक 'आरक्षित कुलीन वर्ग' (Reserved Elite) बन गया है।

3.  प्रतिभा पलायन और मानसिक अवसाद (Brain Drain & Youth Frustration): ओपन कैटेगरी (General Category) के गरीब या मध्यमवर्गीय छात्रों के लिए आज प्रतियोगिता बेहद क्रूर हो चुकी है। कई बार 95% अंक लाने वाले सामान्य वर्ग के छात्र का चयन नहीं हो पाता, जबकि आरक्षित वर्ग में बहुत कम अंक पाने वाले का चयन हो जाता है। यह अंतर जब बहुत बड़ा होता है, तो योग्य युवाओं में व्यवस्था के प्रति गहरी नफरत पैदा होती है। इसके कारण देश की सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाएं विदेशों का रुख करती हैं (Brain Drain), जिससे देश को भारी नुकसान होता है।

भाग 3: आधुनिक युग (Modern Age) में आरक्षण की रूपरेखा: किसे मिलना चाहिए और किसे नहीं?

21वीं सदी का भारत 'डिजिटल और ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था' (Knowledge Economy) है। आज के समय में केवल जन्म के आधार पर किसी को विशेषाधिकार देना या वंचित रखना दोनों ही गलत है। आधुनिक युग में आरक्षण का ढांचा पूरी तरह तार्किक, गतिशील (Dynamic) और न्यायसंगत होना चाहिए।

किसे आरक्षण मिलना चाहिए? (The Deserving)

1.  बहु-आयामी गरीबी के शिकार लोग (Multidimensional Poverty): आरक्षण का पहला पैमाना परिवार की वास्तविक आर्थिक और सामाजिक स्थिति होना चाहिए। इसमें केवल सालाना आय नहीं, बल्कि परिवार के पास जमीन कितनी है, वे कच्चे मकान में रहते हैं या पक्के में, और क्या उनके माता-पिता साक्षर हैंइन सभी डेटा पॉइंट्स को जोड़कर एक 'वंचित सूचकांक' (Deprivation Index) बनना चाहिए।

2.  प्रथम पीढ़ी के शिक्षार्थी (First-Generation Learners): जिस छात्र के घर में कोई भी कभी कॉलेज नहीं गया, जिसके माता-पिता अनपढ़ या दिहाड़ी मजदूर हैं, उसे उस छात्र के मुकाबले अतिरिक्त अंक या कोटा मिलना ही चाहिए जिसके माता-पिता पढ़े-लिखे और नौकरीपेशा हैं।

3.  ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों के छात्र: दिल्ली, मुंबई या कोटा जैसे शहरों में रहकर लाखों रुपये की कोचिंग लेने वाले छात्र और उत्तर प्रदेश, बिहार या पूर्वोत्तर के किसी सुदूर गांव के सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले छात्र के बीच 'समान अवसर' की बात करना बेईमानी है। आधुनिक युग में भौगोलिक पिछड़ेपन (Geographical Disadvantage) को आरक्षण का एक बड़ा आधार बनाया जाना चाहिए।

4.  गंभीर दिव्यांगजन और ट्रांसजेंडर समुदाय: ये वो वर्ग हैं जो आज के समय में सबसे ज्यादा सामाजिक उपेक्षा और बुनियादी ढांचे की कमी का सामना करते हैं। इन्हें मुख्यधारा में लाने के लिए नौकरियों और उच्च शिक्षा में विशेष क्षैतिज आरक्षण (Horizontal Reservation) मिलना अनिवार्य है।

किसे आरक्षण नहीं मिलना चाहिए? (The Non-Deserving)

1.  सभी श्रेणियों में 'क्रिमी लेयर' धारक: चाहे वह OBC हो, EWS हो, या सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के अनुसार SC/ST वर्ग होयदि किसी परिवार की आय और संपत्तियां एक निश्चित सीमा से ऊपर हैं, तो उन्हें तुरंत आरक्षण के लाभ से बाहर किया जाना चाहिए।

2.  पीढ़ीगत लाभार्थी (Generational Exclusion): एक परिवार को अधिकतम दो पीढ़ियों तक ही आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए। यदि दादा और पिता दोनों ने आरक्षण के माध्यम से समाज में एक मजबूत आर्थिक और सामाजिक स्थिति प्राप्त कर ली है, तो तीसरी पीढ़ी को सामान्य श्रेणी में प्रतिस्पर्धा करनी चाहिए ताकि उनकी सीट उसी जाति के किसी बेहद गरीब परिवार को मिल सके।

3.  राजनैतिक और आर्थिक रूप से मजबूत जातियां: कई राज्यों में ऐसे भूमिपति और राजनैतिक रूप से शक्तिशाली समुदाय हैं जो समृद्ध होने के बावजूद अपने चुनावी प्रभाव का इस्तेमाल करके आरक्षण की मांग करते हैं। आधुनिक युग में ऐसी मांगों को पूरी तरह खारिज किया जाना चाहिए।

भाग 4: वो क्षेत्र जहाँ आरक्षण बिल्कुल लागू नहीं होना चाहिए (Zero Reservation Sectors)

आरक्षण एक सामाजिक कल्याणकारी नीति है, लेकिन इसे देश के अस्तित्व, सुरक्षा और वैज्ञानिक प्रगति की कीमत पर लागू नहीं किया जा सकता। कुछ क्षेत्र पूरी तरह 'योग्यता-आधारित' (Strict Merit-Based) होने चाहिए।

क्षेत्र (Sector)

आरक्षण लागू होने का कारण (Why?)

इसका महत्व और प्रभाव (Importance)

1. रक्षा और सशस्त्र बल (Defense & Military)

युद्ध और राष्ट्रीय सुरक्षा केवल शारीरिक और मानसिक रूप से सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन की मांग करती है, वहां किसी भी प्रकार की रियायत नहीं दी जा सकती।

एक सैनिक की चूक से देश की सीमाएं खतरे में पड़ सकती हैं और हजारों बेगुनाह जवानों की जान जा सकती है।

2. सुपर-स्पेशियलिटी चिकित्सा (Super-Specialty Medicine)

न्यूरोसर्जरी, कार्डियोलॉजी, और ऑर्गन ट्रांसप्लांट जैसे क्षेत्रों में डॉक्टर की योग्यता का स्तर उच्चतम होना अनिवार्य है।

यहाँ सीधे तौर पर इंसान की जिंदगी और मौत का सवाल होता है। देश के सर्वोच्च सर्जन्स का चयन सिर्फ और सिर्फ उनकी कार्यकुशलता के आधार पर होना चाहिए।

3. अंतरिक्ष, परमाणु और रक्षा अनुसंधान (ISRO, BARC, DRDO)

इन संस्थानों में भारत अमेरिका, चीन और रूस जैसे देशों से मुकाबला करता है। यहाँ काम करने वाले वैज्ञानिकों की सोच और प्रतिभा वैश्विक स्तर की होनी चाहिए।

अंतरिक्ष और परमाणु तकनीक में छोटी सी गलती भी परमाणु आपदा का कारण बन सकती है या अरबों रुपये के सैटेलाइट मिशन को नाकाम कर सकती है।

4. उच्च स्तरीय न्यायपालिका (Supreme Court & High Courts)

न्यायाधीशों का काम संविधान की रक्षा करना और न्याय देना है। इसके लिए कानून की गहरी समझ, परिपक्वता और निष्पक्षता की जरूरत होती है।

न्यायपालिका लोकतंत्र का अंतिम स्तंभ है। यहाँ नियुक्तियां जातिगत प्रतिनिधित्व के आधार पर नहीं, बल्कि बेदाग छवि और कानूनी विद्वत्ता के आधार पर होनी चाहिए।

5. डीप टेक और कोर रिसर्च (AI & Quantum Computing)

आधुनिक युग में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सेमीकंडक्टर और क्वांटम कंप्यूटिंग जैसी तकनीकें देश की आर्थिक रीढ़ बन रही हैं।

यदि इन रिसर्च संस्थानों में योग्यता से समझौता किया गया, तो भारत तकनीकी रूप से दूसरे देशों पर निर्भर बनकर रह जाएगा।

 

इसका सही समाधान क्या है?

इन महत्वपूर्ण और संवेदनशील क्षेत्रों में एंट्री के समय योग्यता के मानदंडों को कम करने (Lowering the bar) के बजाय, सरकार को शुरुआती स्तर पर (Bottom level) भारी निवेश करना चाहिए। पिछड़े और गरीब बच्चों को बचपन से ही बेहतरीन मुफ्त शिक्षा, वर्ल्ड-क्लास इंफ्रास्ट्रक्चर और मुफ्त कोचिंग फेलोशिप मिलनी चाहिए, ताकि वे अपनी प्रतिभा के दम पर बिना किसी बैसाखी के इन शीर्ष पदों तक पहुंच सकें। योग्यता से समझौता किए बिना समानता लाना ही आधुनिक भारत का असली रास्ता होना चाहिए।

निष्कर्ष: आधुनिक युग का न्यायसंगत मार्ग (The Way Forward)

आरक्षण को हमेशा के लिए एक राजनीतिक बैसाखी नहीं बनाया जा सकता, और ही इसे अचानक खत्म करके देश की बड़ी आबादी को दोबारा सामाजिक असुरक्षा में धकेला जा सकता है। इसका सही समाधान "प्रवेश द्वार पर रियायत के बजाय, शुरुआत में सशक्तिकरण" है।

     प्राइमरी लेवल पर भारी निवेश:  देश के हर गरीब, दलित और आदिवासी बच्चे को बचपन से ही वही विश्वस्तरीय शिक्षा, कंप्यूटर लैब और पोषण मिलना चाहिए जो एक अमीर के बच्चे को मिलता है।

      मुफ्त राष्ट्रीय कोचिंग नेटवर्क:  IIT, AIIMS, UPSC और रक्षा सेवाओं के लिए सरकार को वंचित वर्ग के होनहार छात्रों को पूरी तरह मुफ्त और उच्च स्तरीय कोचिंग स्कॉलरशिप देनी चाहिए।

जब नींव मजबूत होगी, तो हाशिए पर रहने वाला बच्चा भी अपनी प्रतिभा के बल पर बिना किसी आरक्षण या बैसाखी के दुनिया के सबसे कठिन क्षेत्रों में शीर्ष स्थान हासिल करेगा। यही आधुनिक भारत का वास्तविक और स्थायी न्याय होगा।

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